नवरात्री में Maa Durga को प्रसन्न करने लिए गरबा डांडिया का रास |

नवरात्री में Maa Durga को प्रसन्न करने लिए गरबा डांडिया का रास |

गरबा का आरंभ घट स्थापना के साथ ही शुरू हो जाता है। दिया जलाकर इसकी शुरुआत होती है। इसे दीपगर्भ के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि गरबा नृत्य  मां दुर्गा तो काफी पसंद होता है। मां को प्रसन्न करने के लिए गरबा नृत्य किया जाता है। इस दौरान दीप प्रज्वलित कर महिलाएं ताली, डंडा, मंजीरा आदि बजाते हुए उसके चारों ओर गरबा नृत्य करती है। 

कैसे प्रचलन में आया गरबा शब्द

भारत में नवरात्रि के दौरान गरबा और डांडिया खेलने की परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है। पहले ये खेल केवल गुजरात और राजस्थान तक ही सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई और अब इस बड़े ही धूमधाम से पूरे भारत में खेला जाता है। गरबा शब्द असल में संस्कृत शब्द गर्भ-दीप से बना है। यहां गर्भ नारी की सृजन शक्ति का प्रतीक है। गरबा इसी दीप गर्भ का अपभ्रंश रूप है, जो आज चलन में है।

ऐसे खेला जाता है गरबा

सदियों से चली आ रही परम्परा के अनुसार, नवरात्रि के पहले दिन मिट्टी के घड़े में कई छेद किए जाते हैं। इसके बाद एक दीप प्रज्वलित करके इसके अंदर रखा जाता है। साथ ही एक चांदी का सिक्का भी रखा जाता है। इस दीपक को ही दीप गर्भ कहा जाता है, जिसके आस-पास लोग गरबा खेलते हैं। माना जाता है कि गरबा करने से माता रानी प्रसन्न होती हैं।

इसलिए दीप गर्भ की स्थापना के पास महिलाएं और पुरुष रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर माता शक्ति के समक्ष नृत्य करती हैं। गरबा के दौरान महिलाओं द्वारा 3 तालियां भी बजाई जाती हैं जो त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित मानी जाती है। 3 तालियां बजाकर तीनों देवताओं का आह्वान किया जाता है। साथ ही गरबा के दौरान चुटकी, डांडिया और मंजीरों का उपयोग किया जाता है। ताल से ताल मिलाने के लिए स्त्री और पुरुष समूह बनाकर नृत्य करते हैं।