GEN-Z: सोच बदली या संस्कार? प्रदर्शनों और सोशल मीडिया पर लड़के-लड़कियों द्वारा खुलेआम गालियों और आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग किया जा रहा है।
नई पीढ़ी बड़े-बुजुर्गों के प्रति आदर और भाषा की मर्यादा भूलती जा रही है।
हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शनों (जैसे नीट पेपर लीक विरोध) में 'Gen-Z' (नई पीढ़ी) के युवाओं द्वारा इस्तेमाल की गई बेबाक और फूहड़ भाषा को लेकर सोशल मीडिया और मीडिया में संस्कारों के पतन पर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। इस पर समाज में दो तरह के विचार सामने आ रहे हैं।
अगर यह भाषा हमारे घरों में घुस गई, तो क्या होगा?
डिजिटल दुनिया की भाषा कोई ऐसा लिबास नहीं है जिसे घर के दरवाज़े पर उतार कर अंदर आया जा सके। जो भाषा हम स्क्रीन पर दिन-रात पढ़ते और लिखते हैं, वही धीरे-धीरे हमारी दिनचर्या और बातचीत में उतर आती है। अगर यह भाषा हमारे पारिवारिक दायरे में पूरी तरह दाखिल हो जाती है, तो हमें इसके गंभीर बुरे परिणाम देखने को मिल सकते हैं:


