माँ मातंगी धाम महातंत्र काट - आयोजन के विज्ञापन में मुख्यमंत्री, मंत्री, भाजपा अध्यक्ष, सांसद, विधायक, महापौर, सभापति व निगम मंडल आयोग के अध्यक्ष की तस्वीरें क्यों?

माँ मातंगी धाम महातंत्र काट - आयोजन के विज्ञापन में मुख्यमंत्री, मंत्री, भाजपा अध्यक्ष, सांसद, विधायक, महापौर, सभापति व निगम मंडल आयोग के अध्यक्ष की तस्वीरें क्यों?

 *महातंत्र काट क्या है? धार्मिक आस्था, प्रेत दरबार और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल*

*मुख्यमंत्री, मंत्री, भाजपा अध्यक्ष, सांसद, विधायक, महापौर, सभापति व निगम मंडल आयोग के अध्यक्ष जवाब दें : माँ मातंगी धाम के विज्ञापन में आपकी तस्वीरें क्यों?

*धार्मिक आयोजन की वास्तविक प्रकृति क्या है और अनुमति किन शर्तों पर दी गई?*

जनहित व जागरूकता लेख : 

रायपुर में माँ मातंगी धाम दिव्य दरबार के नाम से आयोजित *पाँच दिवसीय महातंत्र काट एवं दिव्य दरबार* कार्यक्रम को लेकर कई ऐसे सवाल सामने आए हैं, जिनका उत्तर केवल आयोजकों को ही नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन और उन सभी संबंधित जनप्रतिनिधियों को भी देना चाहिए जिनकी तस्वीरें आयोजन के प्रचार में दिखाई देती हैं।

अनेक समाचार पत्रों के रायपुर संस्करण में 24 अक्टूबर 26 को “माँ मातंगी धाम दिव्य दरबार” के आयोजन का फूल पेज विज्ञापन छापा गया है। 

विज्ञापन में डॉ. प्रेमसाई का बड़ा चित्र, माँ मातंगी की प्रतिमा और अनेक राजनीतिक तथा सार्वजनिक व्यक्तियों के चित्र हैं।

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि कोई धार्मिक आयोजन क्यों हो रहा है। प्रश्न यह है कि ऐसे आयोजन के विज्ञापन में मुख्यमंत्री, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, महापौर, नगर निगम सभापति, भाजपा के प्रदेश एवं शहर जिला अध्यक्ष तथा निगम-मंडल-आयोगों के अध्यक्षों की तस्वीरें प्रदर्शित किए जाने से जनता के बीच क्या संदेश जाता है?

*क्या आम नागरिक यह समझे कि आयोजन को सरकार का समर्थन प्राप्त है?*

 क्या संबंधित जनप्रतिनिधियों ने अपनी तस्वीरों के उपयोग की अनुमति दी है? क्या उन्हें कार्यक्रम की वास्तविक प्रकृति की जानकारी है? क्या वे केवल धार्मिक शुभकामना देने वाले हैं, कार्यक्रम के आमंत्रित अतिथि हैं या आयोजन के प्रचार में उनकी तस्वीरों का उपयोग उनकी जानकारी के बिना किया गया है?

इन प्रश्नों को उठाना किसी धर्म या व्यक्ति का विरोध नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय राज्य के संवैधानिक प्रमुख हैं। राज्य की जनता उनसे अपेक्षा करती है कि धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान हो, कानून का पालन हो और किसी नागरिक को भय, भ्रम या कथित चमत्कारों के नाम पर अनुचित तरीके से प्रभावित किए जाने की शिकायत हो तो उसकी निष्पक्ष जाँच की जाए।

यहां सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार को इस आयोजन की वास्तविक प्रकृति, विज्ञापन में किए गए दावों और प्रशासन द्वारा निर्धारित शर्तों की पूरी जानकारी है?

यदि किसी धार्मिक कार्यक्रम में पूजा, भजन, कथा और आध्यात्मिक प्रवचन हो रहे हैं, तो उसकी स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को यह कहकर भयभीत किया जाता है कि उसके ऊपर भूत-प्रेत, जिन्न, ऊपरी साया या किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा कराया गया जादू-टोना है, इस आयोजन में स्पष्ट लिखा है की पांच दिवसीय महातंत्र काट एवं दिव्य दरबार है, महातंत्र काट का सर्वविधिक मतलब है कि आपके ऊपर हुए तंत्र को काटना, क्या शासन प्रशासन द्वारा इस तरह के कृतियों के लिए दरबार लगाकर तंत्र कट करने की अनुमति दी जा सकती है ?

और फिर अगर भविष्य में उससे किसी विशेष सामग्री, ताबीज, अनुष्ठान या कथित सिद्ध उपाय के लिए धन माँगा जाता है, तो ऐसी शिकायतों के लिए जिम्मेदार कौन होगा ? जाँच कौन करेगा ?

क्या मुख्यमंत्री यह स्पष्ट करेंगे कि सरकार की नीति सभी धार्मिक आयोजनों के लिए समान होगी? क्या प्रशासन को निर्देश दिए जाएँगे कि वह आयोजकों की धार्मिक पहचान, राजनीतिक संपर्क या सार्वजनिक प्रतिष्ठा से प्रभावित हुए बिना कानून के अनुसार निर्णय ले?

क्या सरकार यह भी स्पष्ट करेगी कि किसी आयोजन की अनुमति मिलना उस आयोजन में किए जाने वाले प्रत्येक दावे या गतिविधि को सरकार द्वारा प्रमाणित किए जाने के समान नहीं है?

जनता को यह अंतर स्पष्ट रूप से समझाया जाना चाहिए।

. मंत्रिमंडल के सदस्यों से सवाल : क्या आपने अपनी तस्वीर के उपयोग की अनुमति दी है?

किसी मंत्री का सार्वजनिक जीवन केवल उसके विभाग तक सीमित नहीं होता। उसका नाम और चेहरा जनता के बीच शासन की प्रतिष्ठा से जुड़ा होता है।

इसलिए विज्ञापन में जिन मंत्रियों के चित्र दिखाई देते हैं, उनसे सवाल है:

क्या आपने इस आयोजन में अपनी तस्वीर प्रकाशित करने की अनुमति दी है?

क्या आपको आयोजन के उद्देश्य और कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी है?

क्या आप जानते हैं कि इस कार्यक्रम को लेकर दिव्य दरबार और प्रेत दरबार जैसे विषय सार्वजनिक चर्चा में हैं?

क्या आप इस आयोजन में शामिल होंगे, या आपकी तस्वीर केवल प्रचार के लिए लगाई गई है?

यदि आपकी तस्वीर बिना अनुमति इस्तेमाल हुई है, तो क्या आप आयोजकों से स्पष्टीकरण माँगेंगे?

इन प्रश्नों का उद्देश्य किसी मंत्री पर आरोप लगाना नहीं है। उद्देश्य यह है कि जनता को पता चले कि जनप्रतिनिधियों की प्रतिष्ठा का इस्तेमाल किस आधार पर किया जा रहा है।

यदि किसी मंत्री ने केवल सामान्य धार्मिक शुभकामना दी है, तो उसे पूरे आयोजन के प्रत्येक पहलू का समर्थन नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन यदि उनकी तस्वीर का उपयोग जनता को किसी आयोजन की विश्वसनीयता का भरोसा दिलाने के लिए किया जा रहा है, तो इस विषय पर पारदर्शिता जरूरी है।

. सांसदों और विधायकों से सवाल : क्या आपकी तस्वीर आयोजन की स्वीकृति का संकेत बन रही है?

सांसद और विधायक जनता के प्रतिनिधि हैं। वे अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के लिए जवाबदेह हैं।

विज्ञापन में जिन सांसदों और विधायकों के चित्र हैं उन्हें बताना चाहिए कि क्या वे आयोजन की गतिविधियों से परिचित हैं? क्या उन्होंने आयोजकों से कार्यक्रम की प्रकृति के बारे में जानकारी ली है? क्या वे इस बात से सहमत हैं कि धार्मिक आस्था के साथ किसी भी प्रकार के भय या आर्थिक शोषण की संभावना को गंभीरता से देखा जाना चाहिए?

यदि उनकी तस्वीर बिना अनुमति प्रकाशित की गई है, तो क्या वे इसकी सार्वजनिक जानकारी देंगे?

यदि उन्होंने स्वेच्छा से तस्वीर प्रकाशित करने की अनुमति दी है, तो क्या वे स्पष्ट करेंगे कि उनकी सहमति केवल धार्मिक शुभकामना या सामान्य आयोजन तक सीमित है, अथवा वे कार्यक्रम के सभी पहलुओं का समर्थन करते हैं?

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है। उसी प्रकार जनप्रतिनिधियों को भी बिना प्रमाण लगाए गए आरोपों से बचाव का अवसर मिलना चाहिए।

. रायपुर की महापौर और नगर निगम सभापति से सवाल : निगम की महापौर और सभापति जैसे पद स्थानीय शासन और नागरिक सेवाओं से जुड़े हैं। जनता उनसे शहर की सफाई, पेयजल, सड़क, स्वास्थ्य, सार्वजनिक स्थलों की व्यवस्था और नागरिक हितों के विषय में जवाबदेही की अपेक्षा करती है।

जब ऐसे पदों पर बैठे व्यक्तियों की तस्वीर किसी महातंत्र काट आयोजन के बड़े विज्ञापन में दिखाई देती है, तो सवाल उठता है कि क्या यह केवल सामाजिक सहभागिता का संकेत है या किसी विशेष आयोजन के प्रति समर्थन का संदेश भी देता है?

क्या आपने अपनी तस्वीरों के उपयोग की अनुमति दी है? क्या वे कार्यक्रम के वास्तविक स्वरूप से परिचित हैं? क्या उन्हें प्रशासन की अनुमति और उसकी शर्तों की जानकारी है?

यदि नगर निगम या किसी अन्य सरकारी संस्था की ओर से आयोजन के लिए कोई सुविधा, संसाधन या सहयोग दिया गया है, तो उसकी प्रकृति और आधार भी स्पष्ट होना चाहिए। 

. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और रायपुर शहर जिला अध्यक्ष से सवाल है कि क्या वे इस विज्ञापन और उसमें प्रदर्शित तस्वीरों के उपयोग से परिचित हैं?

 क्या पार्टी की ओर से कोई औपचारिक समर्थन दिया गया है?

यदि तस्वीरों का उपयोग बिना अनुमति हुआ है, तो क्या संबंधित पदाधिकारी इस पर स्पष्टीकरण देंगे?

यदि तस्वीरों का उपयोग उनकी जानकारी और सहमति से किया गया है, तो क्या वे जनता को बताएँगे कि उनकी सहमति का दायरा क्या है?

राजनीतिक दलों को धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव का सम्मान करना चाहिए। लेकिन किसी भी दल की सार्वजनिक प्रतिष्ठा को इस प्रकार प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए कि जनता बिना वास्तविक जानकारी के किसी आयोजन के दावों को सरकारी या राजनीतिक मान्यता प्राप्त समझने लगे।

यह प्रश्न भाजपा तक सीमित नहीं है। यही कसौटी सभी राजनीतिक दलों और उनके पदाधिकारियों पर समान रूप से लागू होती है|

. राज्य शासन के निगमों, मंडलों और आयोगों के अध्यक्षों को भी बताना चाहिए कि वे कार्यक्रम के अतिथि हैं? क्या उन्होंने अपनी तस्वीरों के उपयोग की अनुमति दी है? क्या उनके पद से जुड़ी किसी सरकारी संस्था ने आयोजन में कोई सहयोग दिया है? क्या वे केवल व्यक्तिगत धार्मिक या सामाजिक सहभागिता के कारण विज्ञापन में शामिल हैं?

सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की निजी धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए। किसी धार्मिक आयोजन में व्यक्तिगत रूप से शामिल होना अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन सरकारी पद की प्रतिष्ठा और किसी आयोजन के प्रचार के बीच अंतर बनाए रखना भी जरूरी है।

जिला प्रशासन और पुलिस विभाग को भी 5 दिवसीय महातंत्र काट, दिव्य दरबार के के बारे में क्या जानकारी है ? अनुमति किन शर्तों पर दी गई?

इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रश्न यही है कि कार्यक्रम के लिए कौन-सी अनुमति दी गई, उसका दायरा क्या है और उसमें क्या शर्तें रखी गई हैं।

मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआत में प्रेत दरबार की अनुमति को लेकर विवाद हुआ था। बाद की रिपोर्टों में अनुमति दिए जाने का उल्लेख भी सामने आया। रिपोर्टों में अनुमति की शर्तों और कार्यक्रम के स्वरूप को लेकर अंतर दिखाई देता है। इसलिए प्रशासन को वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

जिला प्रशासन, पुलिस और संबंधित अधिकारियों से सवाल है कि क्या आयोजन के लिए लिखित अनुमति जारी की गई है?

अनुमति किस आयोजक या संस्था के नाम पर जारी की गई है?

अनुमति में धार्मिक कथा, भजन, दिव्य दरबार अथवा महातंत्र काट में से किन गतिविधियों की अनुमति है?

क्या कार्यक्रम में लोगों की व्यक्तिगत समस्याएँ सुनने, कथित बाधा दूर करने या अन्य प्रकार के अनुष्ठानों के संबंध में कोई विशेष शर्त रखी गई है?

क्या प्रशासन ने आयोजन के प्रचार में किए गए दावों और वास्तविक कार्यक्रम के बीच समानता की जाँच की है?

क्या आयोजन स्थल पर भीड़ प्रबंधन, यातायात, अग्नि सुरक्षा और आपातकालीन चिकित्सा जैसी आवश्यक व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई है?

यदि कार्यक्रम के दौरान अनुमति की शर्तों का उल्लंघन होता है, तो उसकी निगरानी और कार्रवाई की जिम्मेदारी किस अधिकारी की होगी?

यदि किसी नागरिक से भय दिखाकर धन वसूलने या धोखाधड़ी की शिकायत आती है, तो उसे किस प्राधिकारी के समक्ष दर्ज किया जाएगा?

प्रशासन को इन प्रश्नों का उत्तर तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर देना चाहिए।

यदि अनुमति दी गई है, तो उसकी शर्तों के अनुसार कार्यक्रम की निगरानी की जानी चाहिए। यदि किसी गतिविधि की अनुमति नहीं है, तो उस पर निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। किसी आयोजन को केवल धार्मिक नाम देने से उसके संचालन पर लागू सामान्य कानून समाप्त नहीं हो जाते।

. क्या महातंत्र काट, भूत-प्रेत, जिन्न और कथित ऊपरी साये के नाम पर लोगों को भयभीत किया जा सकता है?

यह प्रश्न अत्यंत गंभीर है, क्योंकि इसका संबंध आम लोगों की मानसिक शांति, पारिवारिक संबंधों, आर्थिक सुरक्षा और स्वास्थ्य से हो सकता है।

किसी व्यक्ति को यह कहना कि उसके परिवार पर किसी ने जादू-टोना कराया है, उसके घर में भूत-प्रेत या जिन्न का साया है, या उसकी परेशानी का कारण किसी दूसरे व्यक्ति की कथित तांत्रिक क्रिया है—ऐसे दावों का लोगों पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ सकता है।

यदि इन बातों को प्रमाणित तथ्य की तरह प्रस्तुत करके भविष्य में किसी व्यक्ति से पैसे लिए जाते हैं, महँगी सामग्री खरीदने के लिए दबाव डाला जाता है, बार-बार अनुष्ठान कराने को कहा जाता है या उसे परिवार के किसी सदस्य पर शक करने के लिए उकसाया जाता है, तो शिकायत की परिस्थितियों के अनुसार धोखाधड़ी, धमकी या अन्य लागू कानूनों के तहत जाँच आवश्यक हो सकती है।

किसी कथित अदृश्य शक्ति के अस्तित्व पर धार्मिक या दार्शनिक विश्वास रखना अलग विषय है। लेकिन उस विश्वास के नाम पर किसी नागरिक को भयभीत करना, आर्थिक नुकसान पहुँचाना अलग विषय है।

सवाल यह है कि यदि किसी कार्यक्रम में ऐसे दावे किए जाते हैं, तो उनके आधार, प्रस्तुति और उनसे जुड़ी आर्थिक गतिविधियों की जाँच कैसे होगी?

. ताबीज, सिद्ध सामग्री और तंत्र काटने के नाम पर धन लेने की आशंका हो तो क्या होना चाहिए?

ताबीज, धार्मिक प्रतीक या पूजा से जुड़ी वस्तु रखना अपने आप में किसी अपराध का प्रमाण नहीं है। अनेक लोग इन्हें अपनी आस्था और परंपरा के अनुसार धारण करते हैं।

लेकिन यदि किसी सामग्री को बेचते समय यह दावा किया जाता है कि वह निश्चित रूप से भूत-प्रेत, जिन्न, जादू-टोना, बीमारी, पारिवारिक संकट या किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा किए गए कथित तंत्र को समाप्त कर देगी, तो ऐसे दावों की सत्यता, प्रस्तुति और उनसे जुड़े आर्थिक व्यवहार की जाँच आवश्यक हो सकती है।

यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से कोई सामान्य धार्मिक वस्तु खरीदता है, तो उसे ठगी कहना उचित नहीं है। लेकिन यदि उसे डराकर, गलत जानकारी देकर, बीमारी या संकट का अनुचित लाभ उठाकर अथवा किसी निश्चित परिणाम की झूठी गारंटी देकर पैसे लिए जाते हैं, तो स्थिति अलग हो सकती है।

इसलिए प्रशासन से माँग है कि यदि ऐसे किसी कृत्य की शिकायत सामने आती है, तो संबंधित सामग्री, विज्ञापन, भुगतान, कथनों और उपलब्ध साक्ष्यों की जाँच की जाए।

 क्या किसी वस्तु को चमत्कारी या सिद्ध बताने का आधार बताया गया है? क्या किसी व्यक्ति को धन देने के लिए भयभीत किया गया? क्या किसी शिकायतकर्ता के पास रसीद, संदेश, वीडियो या अन्य प्रमाण हैं?

. क्या सरकार को ऐसे आयोजनों का समर्थन करना चाहिए?

इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले तीन अलग-अलग स्थितियों को समझना आवश्यक है।

पहली स्थिति: कोई आयोजन धार्मिक कथा, भजन, पूजा, प्रवचन या आध्यात्मिक चर्चा तक सीमित है। ऐसी स्थिति में धार्मिक स्वतंत्रता और कानून के अनुरूप आयोजन की अनुमति का सम्मान किया जाना चाहिए।

दूसरी स्थिति: किसी आयोजन में भूत-प्रेत, जिन्न, कथित बाधा या चमत्कारी सामग्री से जुड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन शिकायत या उल्लंघन का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है। ऐसी स्थिति में केवल संदेह के आधार पर आयोजक को अपराधी घोषित करना उचित नहीं है। दावों की प्रकृति, प्रचार और वास्तविक गतिविधियों को समझना आवश्यक है।

तीसरी स्थिति: किसी व्यक्ति को डराकर पैसे लेने, धोखाधड़ी करने, किसी पर टोनही होने का आरोप लगाकर प्रताड़ित करने या अन्य गैरकानूनी गतिविधि के प्रमाण सामने आते हैं। ऐसी स्थिति में कानून के अनुसार जाँच और कार्रवाई की जानी चाहिए।

सरकार की जिम्मेदारी किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था को प्रमाणित करना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना और कानून का निष्पक्ष पालन सुनिश्चित करना है।

यदि कोई जनप्रतिनिधि किसी धार्मिक आयोजन में जाता है, तो उससे अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सरकार ने वहाँ किए जाने वाले सभी दावों को मान्यता दे दी है। लेकिन यदि सरकारी पद, सरकारी संसाधन या आधिकारिक समर्थन का इस्तेमाल किसी गतिविधि को विश्वसनीय दिखाने के लिए किया जाता है, तो उसके बारे में पारदर्शिता आवश्यक है।

आयोजकों और संबंधित जनप्रतिनिधियों को इस विषय पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। 

. आम जनता से अपील है कि आस्था रखें, लेकिन डर के आधार पर निर्णय न लें

धार्मिक आस्था व्यक्ति का निजी और सामाजिक अधिकार है। लेकिन किसी की परेशानी को देखकर उसे तुरंत भूत-प्रेत, जिन्न, ऊपरी साये या किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा किए गए कथित जादू-टोने का परिणाम मान लेना उचित नहीं है।

यदि कोई व्यक्ति ऐसी समस्या का दावा करके आपसे पैसे माँगता है, किसी महँगे ताबीज या कथित सिद्ध सामग्री को अनिवार्य बताता है तो सावधानी बरतें।

किसी भी भुगतान से पहले जानकारी लें। आर्थिक धोखाधड़ी या धमकी की स्थिति में उपलब्ध साक्ष्य सुरक्षित रखें और संबंधित प्राधिकारी से शिकायत करें। किसी पर टोनही होने या जादू-टोना करने का आरोप लगाकर उसे अपमानित या प्रताड़ित न करें।

धार्मिक आयोजन में भाग लेना हर व्यक्ति का निर्णय है। लेकिन भय, दबाव या गलत जानकारी के आधार पर आर्थिक निर्णय लेना किसी के हित में नहीं है।