करू भात खाकर रखती हैं व्रत, क्या है करू भात, क्या है इसकी परंपरा
क्या होता है करू भात
छत्तीसगढ़ी में कड़वा मतलब ‘करू‘ होता है और पके हुए चावल को ‘भात‘ कहा जाता है. इस व्रत पूजा से एक दिन पहले शाम के समय भोजन में करेला की सब्जी भात का भोग लगाएंगी और खीरा खाकर सोएंगी, ताकि अन्न की डकार न आए. इसके बाद कुछ भी नहीं खाती हैं. इस दिन छत्तीसगढ़ के हर घर में करेले की सब्जी खासतौर पर बनाई जाती है.
तीजा पर्व पर करू (कड़वा) भात खाने की परंपरा है. तीजा व्रत रखने के एक दिन पहले करू भात खाया जाता है. करू भात का तात्पर्य है कि करेले की सब्जी बनाकर उस दिन भोजन किया जाता है. इससे यह होता है कि दूसरे दिन जब निर्जला व्रत रखा जाता है उस दिन कड़वा करेला शरीर में एक प्रकार से तरल पदार्थ को उत्सर्जित करती है. इससे प्यास नहीं लगती है, इसलिए छत्तीसगढ़ में परंपरा है कि बहन-बेटियों को करेला सब्जी बना करके भोजन कराया जाता है. यह करू भात के नाम से प्रचलित है.
हरतालिका तीज का महत्व
हरतालिका दो शब्दों हरत और आलिका से मिलकर बना है. हरत का अर्थ अपहरण और आलिका का अर्थ सहेली है. हरतालिका तीज की पृष्ठभूमि में माता पार्वती के जीवन की एक कथा है. कहते हैं कि माता पार्वती के पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से कराना चाहते थे, लेकिन देवी पार्वती को शिव प्रिय थे. तब उनकी सहेलियों ने पार्वती जी को महल से ले जाकर, एक गुफा में छिपा दिया. वहां माता पार्वती ने कठोर तप से भगवान शिव को पति स्वरूप में प्राप्त किया.


