बोल नहीं सकती तो क्या हुआ, लिखकर भी रख सकती हैं अपना पक्ष; छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

बोल नहीं सकती तो क्या हुआ, लिखकर भी रख सकती हैं अपना पक्ष; छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि सुनने और बोलने में असमर्थ होना किसी व्यक्ति को अपने कानूनी अधिकारों की रक्षा करने में अक्षम नहीं बनाता। किसी व्यक्ति को दीवानी मुकदमे में अपना ‘अगला मित्र’ (नेक्स्ट फ्रेंड) नियुक्त करने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि वह मानसिक अक्षमता के कारण अदालत में अपना पक्ष रखने में असमर्थ है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने जगदलपुर की एक महिला की याचिका खारिज कर दी। महिला ने अपने पति को दीवानी मुकदमे में अगला मित्र नियुक्त करने की अनुमति मांगी थी।

मामले की सुनवाई जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की एकल पीठ में हुई। कोर्ट ने कहा कि महिला की सुनने और बोलने संबंधी शारीरिक अक्षमता को नजरअंदाज नहीं किया जा रहा है, लेकिन केवल इस आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह अपने कानूनी हितों की रक्षा नहीं कर सकती। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के 4 अगस्त 2022 के आदेश में हस्तक्षेप करने से भी इनकार कर दिया।

मामला जगदलपुर निवासी अबेदा बानो से जुड़ा है। उनके नाम पर ग्राम नकटीसेमरा में खसरा नंबर 79 की 1.21 हेक्टेयर जमीन दर्ज थी। दंतेवाड़ा निवासी राजेश सुराना और सुनीता सुराना ने दावा किया था कि अबेदा बानो ने 23 सितंबर 2010 को उनके साथ जमीन बेचने का इकरारनामा किया था। जमीन का सौदा 12.08 लाख रुपये में तय हुआ था, जिसमें से पांच लाख रुपये अग्रिम भुगतान किए गए थे।

खरीदारों का आरोप था कि जमीन के डायवर्सन, सीमांकन और अन्य जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के बावजूद अबेदा बानो ने रजिस्ट्री नहीं कराई। इसके बाद उन्होंने अदालत में मुकदमा दायर कर अनुबंध का पालन कराने, इकरारनामे के आधार पर बिक्री विलेख निष्पादित कराने और स्थायी निषेधाज्ञा देने की मांग की।

दूसरी ओर, अबेदा बानो और उनके पति ने अलग से मुकदमा दायर कर इकरारनामे को शून्य घोषित करने की मांग की थी। इसके बाद अबेदा बानो ने दीवानी मुकदमे में अपने पति को अगला मित्र नियुक्त करने के लिए आवेदन दिया। उनका कहना था कि वह जन्म से सुनने और बोलने में असमर्थ हैं, इसलिए अदालत में अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने में कठिनाई होगी।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि अबेदा बानो शिक्षित हैं और पहले भी कई कानूनी व आर्थिक लेन-देन कर चुकी हैं। उन्होंने संपत्ति से जुड़े अन्य सौदे भी किए हैं और अपने नाम से जारी पैन कार्ड का इस्तेमाल किया है। इसके अलावा मुकदमे की शुरुआत से ही उन्होंने अपने पक्ष में अधिवक्ता नियुक्त कर रखा है।

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो कि महिला मानसिक रूप से अस्वस्थ हैं या मानसिक अक्षमता के कारण अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं।

हाई कोर्ट ने दीवानी प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 32 नियम 15 का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को मुकदमे में अगला मित्र नियुक्त करने के लिए केवल शारीरिक अक्षमता पर्याप्त नहीं है। इसके लिए मानसिक दुर्बलता के कारण कानूनी हितों की रक्षा करने में असमर्थता साबित करना आवश्यक है।

कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 119 का हवाला देते हुए कहा कि बोलने में असमर्थ व्यक्ति लिखकर या संकेतों के माध्यम से भी अपनी गवाही दे सकता है। जरूरत पड़ने पर अदालत दुभाषिए या विशेष शिक्षक (स्पेशल एजुकेटर) की मदद भी ले सकती है।

अदालत ने माना कि अबेदा बानो अपने अधिवक्ता के माध्यम से मुकदमे की पैरवी कर सकती हैं। उनके पति भी संवाद करने में उनकी मदद कर सकते हैं, लेकिन केवल सुनने और बोलने में असमर्थ होने के आधार पर पति को कानूनी रूप से अगला मित्र नियुक्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसी के साथ हाई कोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी।